Bakhwala Zamindar Gharana || ग्राम इटौरा बुजुर्ग का महालोधी बखवाला जमींदार घराना

इटौरा बुजुर्ग ज़मींदारी, जिसे ऐतिहासिक और स्थानीय स्तर पर बखवाला घराना के नाम से जाना जाता है, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के महोबा जिले (कुलपहाड़ तहसील) में स्थित एक पूर्व ओर ऐतिहासिक ज़मींदारी थी। इस ज़मींदारी के शासक लोधी क्षत्रिय (राजपूत) समुदाय की 'महालोधी' शाखा से संबंधित थे। मध्यकालीन भारत से लेकर ब्रिटिश काल तक, इस घराने ने बुंदेलखंड के राजनीतिक और सैन्य इतिहास, विशेषकर मुग़ल विरोधी अभियानों और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦इतिहास :- उत्पत्ति और विस्थापन

बखवाला घराने के पूर्वज मूल रूप से बुंदेलखंड की मुस्करा ज़मींदारी से संबंधित थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मुस्करा ज़मींदारी की स्थापना चंदेल राजवंश के शासनकाल के दौरान हुई थी। समय के साथ भौगोलिक और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण, इस महालोधी क्षत्रिय परिवार का एक हिस्सा मुस्करा से विस्थापित होकर गाजीपुर नामक स्थान पर बस गया।

कुछ समय पश्चात्, इस परिवार के तत्कालीन मुखिया लंबरदार इंद्रजीत सिंह महालोधी ने गाजीपुर से निकलकर एक नई ज़मींदारी की स्थापना की, जिसे "इटौरा" नाम दिया गया। वर्तमान में इसी स्थान को 'इटौरा बुजुर्ग' के नाम से जाना जाता है।

♦मुग़ल काल और महाराजा छत्रसाल का उदय

17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब (आलमगीर) ने मध्य भारत में अपने साम्राज्य विस्तार की नीतियां लागू कीं, तब बुंदेलखंड में व्यापक विद्रोह हुए। महाराजा छत्रसाल के नेतृत्व में बुंदेलखंड के विभिन्न क्षत्रिय कुलों—चंदेल, बुंदेला, लोधी, परिहार और राठौड़ आदि—ने मुग़ल सत्ता के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इटौरा की महालोधी ज़मींदारी (बखवाला घराना) ने इस संघर्ष में मुग़लों के विरुद्ध महाराजा छत्रसाल को सैन्य और रणनीतिक समर्थन प्रदान किया था।

♦ ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता संग्राम

बखवाला घराने ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश क्राउन के खिलाफ कई ऐतिहासिक क्रांतियों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भाग लिया।

♦1842 की बुंदेला क्रांति

वर्ष 1842 में बुंदेलखंड में अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियों के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह हुआ, जिसे 'बुंदेला क्रांति' कहा जाता है। इस क्रांति का नेतृत्व हीरापुर के नरेश "महाराजा हृदयशाह लोधी" ने किया था। बखवाला घराने ने इस क्रांति में अपने संसाधनों और सैन्य बल के साथ विद्रोहियों की सहायता की। इसी प्रकार 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी इस ज़मींदारी ने पर्दे के पीछे से क्रांतिकारियों को शरण और आर्थिक मदद उपलब्ध कराई।

♦चरखारी विद्रोह और  शिवदयाल सिंह जी

20वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में इटौरा बुजुर्ग ज़मींदारी के मुखिया लम्बरदार शिवदयाल सिंह बने। उनके कार्यकाल में ब्रिटिश सत्ता के साथ घराने का सीधा टकराव हुआ।

एक राजनीतिक आंदोलन में भाग लेने के कारण ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया।

★उन्हें बंदी बनाकर चरखारी किले (जिसे अंग्रेजों ने कारागार में परिवर्तित कर दिया था) की ओर ले जाया जा रहा था।

★रास्ते में एक सुनियोजित योजना के तहत शिवदयाल सिंह ने पुलिस बल पर हमला कर दिया और अपने सभी साथी क्रांतिकारियों को मुक्त कराने में सफल रहे।

♦कुँवर खलबल सिंह महालोधी जी का योगदान

शिवदयाल सिंह के उत्तराधिकारी उनके पुत्र कुँवर खलबल सिंह हुए। वे एक कुशल पहलवान और घुड़सवार थे। उनके नेतृत्व में ज़मींदारी ने ब्रिटिश कर-वसूली (Tax collection) का खुला विरोध किया। जब ब्रिटिश अधिकारी समीपवर्ती गाँव 'पहाड़िया' में बलपूर्वक लगान वसूलने आए, तो खलबल सिंह ने अपने समर्थकों के साथ उन पर सशस्त्र हमला किया और उन्हें क्षेत्र से खदेड़ दिया। इस घटना के बाद उन्हें बखवाला घराने का नया  ' नियुक्त किया गया।

♦स्वतंत्रता के पश्चात (ज़मींदारी का विलय)

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात्, भारत सरकार द्वारा रियासतों और ज़मींदारियों के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ की गई। जब 'ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम' (Zamindari Abolition Act) का मसौदा तैयार हो रहा था, तब तत्कालीन मुखिया लंबरदार खलबल सिंह ने स्वेच्छा से अपनी ज़मींदारी और संपत्तियों का भारत संघ में विलय कर दिया। सन् 1997 में लंबरदार खलबल सिंह महालोधी जी का निधन हो गया।

♦वर्तमान स्थिति और सांस्कृतिक महत्व

वर्तमान में इटौरा बुजुर्ग ज़मींदारी के वंशज महोबा जिले के उसी गाँव में निवास करते हैं और स्थानीय स्तर पर "बखवाला परिवार" के रूप में पहचाने जाते हैं। वर्तमान में इस परिवार का प्रतिनिधित्व "श्री महेश सिंह महालोधी (राजपूत) जी" कर रहे हैं, जिन्हें क्षेत्रीय नागरिक सम्मानपूर्वक 'दादा' कहकर संबोधित करते हैं। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति में महालोधी क्षत्रिय राजपूतों के सामाजिक प्रभाव को दर्शाने वाली एक प्राचीन कहावत आज भी प्रचलित है:

लोधी बड़ा क्रोधी, कुर्मी बड़ा किसान,

ब्राह्मण बड़ा शक्ति, घर-घर मांगे पिसान

♦संदर्भ (References)

1. बुंदेलखंड का ऐतिहासिक गज़ेटियर (संभावित संदर्भ)

2. 1842 बुंदेला विद्रोह के ऐतिहासिक दस्तावेज़

3. स्थानीय ऐतिहासिक लोककथाएँ और मौखिक इतिहास

4. गोरेलाल तिवारी कृत 'बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास'


 















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